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बचपन

शब्द ही है जो कभी कभी नज्में बनते है,

नज्में ही है जो कभी कभी कुछ याद दिला देती है,

यादें ही है जो उस वक़्त को ज़िंदा रखती है।

एक खुशनुमा बहार जैसा वो वक़्त,

एक ठंडी बौंछार जैसा वो वक़्त,

एक मीठे अमरुद जैसा वो वक़्त,

कभी आधा कच्चा लगता है,

कभी आधा पक्का।

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