रंगनाथिट्टू पक्षी अभयारण्य, कर्नाटक में एक शोर-भरा दिन
हम एक दिन की ड्राइव पर रंगनाथिटु पक्षी अभयारण्य गए: कर्नाटक के सबसे अच्छे स्थानों में से एक और मैसूर के पास घूमने के लिए सबसे अच्छे स्थानों में से एक। सुंदरता से अभिभूत यह जगह मानो अपने पंखो से उड़ा कर कही दूर ले गयी मुझे।
जैसे ही हम रंगनाथिटु राष्ट्रीय उद्यान के पास पहुंचे, हम बड़े पक्षियों के समूहों को हमारे ऊपर उड़ते हुए देख सकते थे। मैसूर शहर का वह हिस्सा जंगल जैसा महसूस होता था। जल्द ही हम मगरमच्छों को चट्टानों पर धूप सेंकते और पक्षियों के छोटे-छोटे बच्चों को खाने के लिए ची ची करते हुए टापूओं पर देखेंगे।
रंगनाथिटु पक्षी अभयारण्य कर्नाटक के मांड्या जिले में एक प्राकृतिक अभ्यारण्य है। रिज़र्व ऐतिहासिक शहर श्रीरंगपट्टनम (कर्नाटक में एक और महत्वपूर्ण स्थान) से तीन किलोमीटर और मैसूर से सोलह किलोमीटर (10 मील) उत्तर में है। बैंगलोर से रंगनाथिटु पक्षी अभयारण्य तक की ड्राइव में हमें लगभग चार घंटे लगे।
रंगनाथिटु द्वीपों का निर्माण तब हुआ जब मैसूर के तत्कालीन राजा द्वारा 1645 और 1648 के बीच कावेरी नदी पर एक तटबंध बनाया गया था। ये टापू, जिनकी संख्या मूल रूप से पच्चीस थी, जल्द ही पक्षियों को आकर्षित करने लगे। एक बार की बात है, पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने द्वीपों पर बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को घोंसला बनाते हुए देखा। उनके सुझाव पर, मैसूर के राजा ने 1940 में द्वीपों को एक संरक्षित क्षेत्र घोषित किया। अब अभयारण्य कावेरी नदी पर इनमें से छह द्वीपों द्वारा बनाया गया है।
जैसे ही हम रंगनाथिटु पहुंचे, हमने एक टिकट खरीदा और अंदर चले गए। अभयारण्य के अंदर हम अपने नीचे कावेरी द्वीप देख सकते थे, और हमारे ऊपर आकाश में चित्रित सारस, आईबिस, पेलिकन और बगुले उड़ रहे थे। कम से कम ये वे पक्षी थे जिन्हें मैं पहचान सकती थी। जब हमने विशेष नाव की सवारी की, जिसमें सात लोग सवार थे और हम सब को चालीस मिनट तक अभयारण्य में घुमाया जाना था, तो नाविक ने हमें बताया कि रंगनाथिटु अभ्यारण्य में कम से कम एक सौ सत्तर प्रजातियों के पक्षी रहते हैं। पाए जाने वाले कुछ सामान्य पक्षी हैं चित्रित सारस, घोंघिल, ऊनी गर्दन वाला सारस, पेलिकन, रिवर टर्न, जलकाग, बगुले और नीलकंठ की किस्में।
रंगनाथिटु पक्षी अभयारण्य का दौरा करने का सबसे अच्छा समय दिसंबर से मार्च तक है, और हम समय सीमा के भीतर थे। इन महीनों के दौरान प्रवासी पक्षी साइबेरिया, दक्षिण अमेरिका और हिमालय तक से रंगनाथिटु आते हैं, और वे सभी पक्षी अभयारण्य में घोंसला बनाते हैं। आप वहां मगरमच्छ, ऊदबिलाव, नेवले और चमगादड़ की उड़ने वाली लोमड़ि प्रजाति को भी देख सकते हैं। बस अपनी आंखें खुली रखें और दूरबीन को फोकस में लाये।
मैंने अपना ये अनुभव एक कविता में लिखा। आखिरकार, प्रकृति और कविता से बेहतर क्या है?
तो वो कविता आपके सामने पेश करती हूँ।

जैसे ही हमने विहार में प्रवेश किया, ऊपर बादलों से पटे आकाश में चित्रित सारस उड़ने लगे,
और हम स्वर्ग की ओर ताकते हुए,
मटियाली कावेरी के किनारे चलने लगे,
सफेद और सलेटी पक्षियों के झुंड के झुंड छोटे-छोटे दीपों पर स्थित अर्जुन वृक्षों पर बैठे थे,
ठंडी करारी हवा उनके गीतों से झनक रही थी,
हालांकि मैं उन ध्वनियो में से एक को भी नहीं पहचान पायी।
हम इन पंखो वाली पहेलियों को पहचानने के लिए दूर हरियाली में टकटकी लगा देख रहे थे,
लेकिन हमारी आंखों ने पक्षियों के बजाय तीन मगरमच्छ ढूँढ लिए, जो अपने खुले जबड़ों के साथ चट्टानो पर विश्राम फ़रमा रहे थे,
जैसे वो इंतज़ार कर रहे थे की कोई मछली उनके मुंह में गोता लगाएगी।
उनकी स्थिरता ने हमें सोचने पर मजबूर किया की वो असली थे या नकली,
और फिर हमने उनमें से एक को ठंडे पानी में उतरते हुए देखा,
जैसे की हमें अपने पीछे-पीछे आने के लिए लुभा रहा हो।
जंगल के करीब जाने के लिए हम एक नाव में बैठे,
और जैसे ही हमारी नाव कावेरी के उथले पानी में रास्ता बना चल पड़ी,
सलेटी रंग के जलकाग और सफेद और बड़े बगुले चारों और उड़ने लगे,
जबकि मवेशि बगुले आराम से बैठे थे,
सीना चौड़ा किए अपने सुनहरे सिर की प्रदर्शनी कर रहे थे।
गुंगले झुंडो में बैठे थे ऐसे पेड़ों पर,
जो पानी में छातों की तरह खड़े थे।
सौभाग्य से हमने हवासील दूर से ही देखें,
क्यूँकि उनके गले एक मानव को समा जाने की क्षमता रखते थे,
और भूरे और सफेद आइबिस हमें ऊपर से देख रहे थे,
एक स्याह बादल के साथ,
जिसकी पूंछ पर एक छुटकु सा भी था,
एक पल वे दोनो धीरें चलते थे, तो दूसरे पल तेज़ी से आगे भागने लगते थे,
जैसे कि पिताजी शिशु को उड़ने के साथ-साथ शौखीबाज़ी भी सिखा रहे थे।
हम आगे बढ़ते रहे,
छोटे-छोटे दीपों की श्रृंखला से गुज़रते हुए,
हमारी नौका पक्षियों से लबालब पेड़ों के झुंडो के क़रीब से निकलती रही।
मुझे समझ नहीं आ रहा था की कहा देखूँ,
क्योंकि वे सब पंछी एक जैसे दिखते थे,
कोई अपने घोंसले से हमें देखता था,
जिसके अंदर एक, दो, या तीन बड़े बच्चे थे,
तो कुछ शाखाओ पर बैठे जासूसी कर रहे थे।
लेकिन किसने कहा कि वे सभी सामाजिक नियमो का पालन कर रहे थे,
जबकि कुछ अपनी चोंच में पत्तियों और डालियों के साथ उड़ान भर रहे थे,
तो अन्य अपने मात्रत्व और पितर्तव में महीनो आगे थे,
जब मैं उनके समाज के बारे में सोच रही थी,
तभी हमने एक विशाल मगरमच्छ देखा,
बस एक दीप के किनारे आराम करता हुआ,
और जैसे ही हमारी नाव पानी में आगे बढ़ी,
वह भी पानी में उतर गया।
हमारा नाविक नाव को चला रहा था,
और मगरमच्छ बराबर में तैर रहा था।
चारों ओर की हरियाली में झींगुर एवं साइकैडा झू-झू कर रहे थे,
हल्की-हल्की हवा पानी की सतह पर तैर रही थी,
और पानी की पतली-पतली लहरें बना कर उनको नचा रही थी,
लहरें जो दिन की चाँदनी से चमक रही थी,
हवा ने बांस के पेड़ों को झुकाया और बदले में वो तिड़क पड़े,
और उनकी पत्तियां ऐसे शोर मचा रही थी,
जैसे कि एक प्रेमी कहीं अपनी प्रेमिका की काँच की चूड़ियों के साथ खेल रहा हो।
प्रकृति के इस बुलबुले में,
हवा में तैरती हुई चित्रित सारसे,
साथ में जलकाग,
चित्रित सारस के मटियाले बच्चे पत्थर के द्वीपों पर अपनी माओं का इंतजार करते हुए,
चितला कौडियाल अपने जेबरा पंखों को फड़फड़ाते हुए,
दूर कही गाती हुई कोयल,
हवा में झूमते नारियल के ऊँचे पेड़,
बड़े-बड़े समूहों में शांतिपूर्ण हवासील और सफेद सारस,
सभी ने मिलकर मुझे एक अलग ही दुनिया में पहोचा दिया,
जिस दुनिया को मैंने केवल सपनो में देखा था,
और फिर बादल नृत्य करने लगे,
और उनकी बूंदा ने हमें चारों तरफ़ से परदों में घेर लिया।
ठंडी रुहीन हवा ने बारिश के पानी को हमारे चेहरे पर छिड़का,
और टेढ़ी बारिश ने हमें भिगो दिया।
बारिश के साथ-साथ, एक चित्रित सारस उड़ता हुआ आया,
और अपने बच्चों के ऊपर आ कर उसने अपने पंख बहोत धीरें-धीरें फड़फड़ाये,
जबकि उसके पैर बस उसके शरीर से लटक रहे थे,
फिर उसने अपने पंखों को अपने चारों तरफ़ लपेट लिया
और फिर अपने पैरों से पत्थरों पर उतरा,
अपने भीगते हुए छोटे बच्चों के क़रीब होने के लिए।
ये सब मानो बहोत ही धीमें धीमें हो रहा था।
उस पल में,
पानी की बूँदो ने मेरे गालों को सराहा,
और मैंने अपनी आंखें बंद कर दीं
और दुनिया के साथ ख़ुद को एक महसूस किया।
मैं भी एक बांस के झुंड के नीचे एक बेंच पर बैठी, कावेरी के बगल में,
अपने पंखो वाले दिन के बारे में लिखने के लिए,
बाँस ऐसे शोर मचा रहे थे मानो किसी भी पल वो मुझे मार सकते थे,
और बड़ी लाल चींटियाँ मुझ पर रेंगने लगी,
जैसे कि मुझे अपने निवास से दूर जाने के लिए कह रही हो,
या शायद प्यार से मुझे गले लगा रही थी।
मुझे नहीं पता था की
सूर्यास्त हुआ था की नहीं,
लेकिन पक्षियों को बेहतर पता था,
क्योंकि वो रात को सोने से पहले वाला तांडव कर रहे थे।
एकमात्र तांडव जो मुझे सुनने के लायक लगा।
पास में कॉलेज के दोस्तों के एक समूह ने आदिवासियों जैसा शोर मचाया,
और मैं अफ्रीका या शायद ऐमज़ॉन के जंगलो में चलने लगी,
जबकि जीवन से भरपूर कावेरी मेरे आगे दौड़ रही थी।
पक्षी उन्ही पुरानी शाखाओं पर बैठ गए,
जो उन्हें घर जैसी महसूस होती होगी।
मैंने सोचा की क्या वो हर रात एक ही पेड़ पर गुज़ारते थे या फिर एक अलग पेड़ पर,
या वो शाखाएँ बदलते थे या नहीं।
मुझे समय के साथ पता लगाने की उम्मीद थी।
क्यूँकि फिर मुझे अपने घर लौटना था,
मैं उन पक्षियों को देखने और सुनने के लिए फिर से जाऊँगी,
तब तक चित्रित सारस के बच्चे अच्छे से गुलाबी हो जायेंगे,
और शायद मैं एक या दो ध्वनिया पहचानने में सक्षम हो जाऊँगी।
तब तक, उन पक्षियों को हवा में उड़ने देते हैं,
और अपनी उड़ान से आकाश को रंगने देते है।

























रंगनाथिट्टू पक्षी विहार, कर्नाटक आने-जाने की योजना ऐसे करें
हम गाड़ी में बैंगलोर से पक्षी विहार गए थे। यह यात्रा लगभग चार घंटे लंबी थी। मैसूर से यह यात्रा और भी छोटी है, और बहोत पर्यटक जो मैसूर घूमने जाते है, रंगनाथिट्टू पक्षी अभयारण्य भी देखते हुए आते है!
विहार में कई रेस्तरां थे, इसलिए खाने की कोई समस्या नहीं होगी। यदि आपके पास एक अच्छा कैमरा और दूरबीन है, तो उन्हें ज़रूर ले जाए। यात्रा करने का सबसे बेहतरीन समय दिसंबर से जून तक है। प्रवासी पक्षी दिसंबर में आते हैं और फरवरी से घोंसले बनाने शुरू करते हैं। अभयारण्य कावेरी और इसके द्वीपों के आसपास स्थापित है। हमारे पास कयी नावों की सवारी करने का विकल्प था, और हमने उनमे से एक विशेष सवारी का चयन किया जो चालीस मिनट लम्बी थी, लगभग सात लोगों को ले जाती थी, और सामान्य सवारी से और दूर तक ले जाती थी। हमने एक और परिवार को हमारे साथ चलने के लिए कहा ताकि हम विशेष सवारी (1500 रुपये) की कीमत को आधा-आधा बाँट सकें। आप अभयारण्य के बगीचों में भी घूम सकते हैं, और उन पर लगे खूबसूरत फलो और फूलों के साथ-साथ उन पर बैठे छोटे पक्षियों को भी देख सकते है।
मज़े कीजिए।
मैसूर में ठहरने के स्थानों के बारे में मैंने मैसूर के लेख में विस्तार से लिखा है। यहाँ पढ़िए।


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