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मेरी और आपकी महफ़िल

मैं : तुम से पागल को मिल के कुछ यूँ लगता है सनम ; यूँ खुद से गुफ्तगू , हम यूँ ही कर रहे थे | आप: खुद को पागल तो कह दिया तुमने यूँ ; पर कैसे बंया करे , कि तुम्हारी हर गुफ्तगू में हम शरीक थे|   मैं:  क़ायल यूँ तुझ पे, …

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हमें तो अपना नाम कुछ पन्नो पर छोड़ जाने की इच्छा है!

कहानिया और क़िस्से तो बहोत सुने, पर अब ख़ुद के बनाने की इच्छा है, दूसरे कवियों के शब्दों के साथ तो मैं बहोत उड़ी, पर अब औरों को उड़ाने की इच्छा है, वक़्त के साथ खिलवाड़ तो बहोत किया, पर अब उसको सर-आँखो पर बिठाने की इच्छा है, हम करेंगे, हम करेंगे, हम करेंगे, ये कहते-कहते …

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खाली पन्ने

बहोत कापियों के पन्ने भरे है तुम्हारी मोहब्बत में, कविताएँ, कहानिया, किस्से, गाने,  जाने क्या-क्या नहीं लिख डाला, तब तो सनम तुमने कदर न की,  अब जब खाली ही पन्ने पढोगे तब याद आएँगे हम तुम्हें !

एक घर

घर बसाना चाहती हूँ एक तुम्हारे साथ छोटा सा, दूर उस नदी के पार,  क्यारियों में लाल गुलाब लगायेगे,  उस नीम के पेड़ पर झूला डलवाएगे,  दीवारों पर तुम्हारी मेरी तस्वीरें लगायेगे, तस्वीरो से झांकती हुई हंसी में खिलखिलाएगे,  चिड़िया मैना के लिए एक छोटी सी मटकी टाँगेगे, बच्चे जब निकलेगे उनके, उन्हें फुर-फुर उड़ाएँगे,  …

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रुखसत

जब  भी मैं देखती हूँ खुद को आईने में, ऐसा क्यूँ लगता है कि कुछ अधूरा है, क्या है कुछ समझ नहीं आता, प्रतिबिम्ब भी मेरा कुछ नहीं बतलाता दूर तुमने किया है, समझाया भी है बहोत मुझे, काश तुम समझ पाते, ऐसे नहीं समझायी जाती ये बातें रुखसत किया जो जीवन से एक बार, …

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ये कैसा जीवनसाथी मिला है

ये कैसा जीवनसाथी मिला है, जिसके बारे में सोच कर, मन को इतना सुकून मिलता है, हमने तो उलटा ही देखा था अक्सर, लोग अपने पति और प्रेमी से बच–बच कर भागते है,  और वो तो कीचड़ से लथपथ सड़क पर हमारे पैरों की धूल पत्ते तोड़ कर उनसे रगड़–रगड़ कर साफ़ करता है, हमारे नाख़ून घिसना …

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इन्द्रधनुष!

जैसे शांख होती है ना बिना पत्तो के,

जैसे सर्दियों में माटी होती है, बारिश के इंतजार में,

जैसे पत्तझड़ में धरती होती है सूखे पत्तो से पटी,

पर सूरज से वंचित,

जैसे पूर्णिमा के चाँद पर बादल छा जाता है कभी-कभी,

जैसे मछली होती है पानी के बाहर,

ऐसा ही है मेरा अस्तित्व तुम्हारे बिना,

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मेरे मन का चंदन दर्पण

बस कुछ ही पल लगते है,

जैसे कुछ ही पलो में हवाई जहाज़ बादलों के बीच में पहोच जाता है,

वैसे ही कुछ ही पलो में जीवन में कुछ भी बदल सकता है,

हम ख़ुद को पंख दे कर उड़ा भी सकते है,

और ख़ुद को वज़न से पाताल की गहराइयों में खींच भी सकते है,

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तुम

वो पिछली सुबह जो एक बूँद मोती की तरह  बैठी थी ना पत्ते पर,

याद है तुम्हे?

जिसे घूँट भर पी लिया था मैंने,

जाने कैसे एक बूँद से प्यास बुझी थी?

मुझे लगता है तुम वही बूँद हो!

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एहसास

तेरी ख़ुशबू है आती अभी तक मेरी रूह से 

तेरे स्पर्ष का है एहसास बाकि अभि

तेरे हाथों की गर्मी को महसूस करती हूँ मैं

तेरे होंठो की नर्मी एहसास भी गया नहीं

बालों मे हर सनसनाहट का तू ही जिम्मेदार है  

होंठो के कपकपाने की वजह भी है तू ही 

उन सुन्हरी सुबहों मे साथ तु था जब 

मुस्कुराती हुई आती थी किरने भी  

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चाँद

जब कोई चिड़िया चहकती है,

सूरज उगता है,

हवा चलती है,

तभी मेरी क़लम भी थिरकती है,

जब सुबहसुबह प्रक्रति शृंगार करती है,

मैं उसको निहारती हूँ,

पानी में तैरते हुए,

या तैरने की कोशिश करते हुए,

ऊपर आसमान में अपनी नज़रें फिराती हूँ,

बादल उड़ते नज़र आते है,

रूयी जैसे हल्के बादल,

हल्के-सफ़ेद, हल्के-नीले, हल्के-स्याह,

भागे चलें जाते है,

दूरदूर उन लोगों की पुकार पूरी करने जो उनहें चाहते है,

जिनको रोटी नसीब नहीं होगी या प्यास से उनके गले और होंठ सूख जायेंगे!

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बचपन

शब्द ही है जो कभी कभी नज्में बनते है,

नज्में ही है जो कभी कभी कुछ याद दिला देती है,

यादें ही है जो उस वक़्त को ज़िंदा रखती है।

एक खुशनुमा बहार जैसा वो वक़्त,

एक ठंडी बौंछार जैसा वो वक़्त,

एक मीठे अमरुद जैसा वो वक़्त,

कभी आधा कच्चा लगता है,

कभी आधा पक्का।

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