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मेरी और आपकी महफ़िल

मैं : तुम से पागल को मिल के कुछ यूँ लगता है सनम ; यूँ खुद से गुफ्तगू , हम यूँ ही कर रहे थे |

आप: खुद को पागल तो कह दिया तुमने यूँ ; पर कैसे बंया करे , कि तुम्हारी हर गुफ्तगू में हम शरीक थे|

 

मैं:  क़ायल यूँ तुझ पे, ऐसे ही नही हैं सनम|

अभी आँखें खोली, तो नज़ारा क्या देखता हूँ? जो मैं था वो तुम निकले, ये ग़ज़ब कश्मकश है|

 

आप: ये कश्मकश नहीं, मैं और तुम है

ऐसा जुर्म ना करो, खुली से नहीं, बंद आँखों से देखो,

नया नहीं, बहोत पुराना ये वाक़या है,

तुम्हारी शख्सियत में मेरी परछाई,

और मेरी में तुम्हारी रहा करती है,

इसलिए तो ये सारा जमाना फब्तियां कसता है।

मैंने कई मर्तबा सोचा तुम्हे बताऊँ,

मुझे यूँ लगा लेकिन, की जैसे तुम्हे पता है।

 

मैं: जाने कब से पता है, मेरा मैं तेरे तू मे बसता है| कश्मकश कुछ ऐसी थी, हम खुद में मैं और तू जुदा कर रहे थे|

अब लगता है खुद में खुदा है, तो कश्मकश

कैसी?

 

आप: हम में खुदा है या खुदा में हम है,

किसको खबर है?

मेरे हमनशी, अब साथ चलें।

उस अंत तक या उस शुरुआत तक,

अब साथ चलें।

हमें तो अपना नाम कुछ पन्नो पर छोड़ जाने की इच्छा है!

कहानिया और क़िस्से तो बहोत सुने,

पर अब ख़ुद के बनाने की इच्छा है,

दूसरे कवियों के शब्दों के साथ तो मैं बहोत उड़ी,

पर अब औरों को उड़ाने की इच्छा है,

वक़्त के साथ खिलवाड़ तो बहोत किया,

पर अब उसको सर-आँखो पर बिठाने की इच्छा है,

हम करेंगे, हम करेंगे, हम करेंगे,

ये कहते-कहते समय बहोत बीत गया,

पर अब अपने वजूद को तराज़ू में ना नाप पाय,

ऐसा बनाने की इच्छा है,

लोग आते है,

लोग जाते है,

पर हमें तो अपना नाम इतिहास के कुछ पन्नो पर छोड़ जाने की इच्छा है,

जैसे रबिंदरनाथ ने सुंदरसुंदर शब्दों को पिरो वाक्य बनाए थे

वैसे ही हमें भी शब्दों के महकते हार बनाने की इच्छा है,

हमें तो अपना नाम इतिहास के कुछ पन्नो पर छोड़ जाने की इच्छा है!

खाली पन्ने

बहोत कापियों के पन्ने भरे है तुम्हारी मोहब्बत में,

कविताएँ, कहानिया, किस्से, गाने

जाने क्या-क्या नहीं लिख डाला,

तब तो सनम तुमने कदर की

अब जब खाली ही पन्ने पढोगे तब याद आएँगे हम तुम्हें !

एक घर

घर बसाना चाहती हूँ एक तुम्हारे साथ

छोटा सा, दूर उस नदी के पार, 

क्यारियों में लाल गुलाब लगायेगे, 

उस नीम के पेड़ पर झूला डलवाएगे

दीवारों पर तुम्हारी मेरी तस्वीरें लगायेगे,

तस्वीरो से झांकती हुई हंसी में खिलखिलाएगे

चिड़िया मैना के लिए एक छोटी सी मटकी टाँगेगे,

बच्चे जब निकलेगे उनके, उन्हें फुर-फुर उड़ाएँगे

सर्दियों में धूप सेंकेंगे आँगन में बैठ कर,

दिन ढलेगा जब, तब अन्दर जायेगे,

चाय पीयेगे बैठ कर घर की देहलीज पर,

दुनिया को देखेगे बस दूर से ही सहज कर,

बसंत में बागीचे के पेड़ पर फूल जब आयेगे,

गुलदस्ता उनका बना कर कमरे में सजायेगे,

बारिशे जब होगी और हवा चलेगी तेज खूब,

खिड़की दरवाजें बंद कर घर में दुबक जायेगे,

ऐसा नहीं है की डर लगता है तूफाँ से मुझे,

तूफाँ तो देख चुकी हूँ बहोत मैं,

महफूज लगता है पर करीब तुम्हारे,

जितना नहीं लगता किसी भी और किनारे!

 

एक बार काश तुम कहते,

भले झूँठ ही सही, 

पर मेरा दिल तो बहलाते,

की जाओगे सब छोड़ कर मेरे लिए,

समेट लोगे मुझे बाहों में अपनी,

उससे ज्यादा कुछ और मुझे चाहिए भी तो नहीं,

यूँ तो मैं लड़ सकती हूँ सबसे,

पर जब बात आती है तुम्हारी,

खुद के ही आगे कमज़ोर पड़ जाती हूँ,

हकीकत के झरोको से सपनो में झांकती हूँ,

तुम्हारे साथ एहसास जो इतने जुडे है,

अलग करती हूँ उन्हें तो वो चीख पड़ते है,

पर तुम चिंता ना करना,

बुझा दूगी उन सपनो के दिए मैं, 

दबा दूगी उन एहसासों को माटी तले,

जो परेशां करते है तुम्हे,

और जिन्हें पूरा करने के लिए शायद दूसरा जन्म हमें लेना पड़े!

रुखसत

जब  भी मैं देखती हूँ खुद को आईने में,

ऐसा क्यूँ लगता है कि कुछ अधूरा है,

क्या है कुछ समझ नहीं आता,

प्रतिबिम्ब भी मेरा कुछ नहीं बतलाता

दूर तुमने किया है,

समझाया भी है बहोत मुझे,

काश तुम समझ पाते,

ऐसे नहीं समझायी जाती ये बातें

रुखसत किया जो जीवन से एक बार,

तो चली तो गयी मैं हमेशा के लिए,

महसूस हुआ पर ऐसे,

कि दिल कदमो तले रख कर कुचला है किसी ने

प्यार करने में  देरी हुई या जल्दबाजी, ये पता नहीं,

तुम नहीं हो मेरे काबिल ये जरूर समझी मैं,

शर्ते लगायी तुमने इतनी कि हैरान थी मेरी तन्हाई भी,

क्या ये शख्स है वही, जिसके लिए हमने घंटो इतनी बातें कि 

जब क्यूँकि लेकिन किन्तु परन्तु हो इतने

नहीं चल पाती दिल कि बात,

जगह ही बचे जहाँ मासूम जज़्बातों कि,  

क्या है औक़ात ऐसी इश्कबाजी कि, 

जाओ तुम, आजाद करती हूँ मैं,

मेरे लिए तुम थे ही नहीं

पूछना चाहती हूँ बस तुमसे एक बार,

दिए क्यों ऐसे एहसास, जो ठन्डे ही सही,

पर अंगारे बन कर दहकते है अब भी अंदर ही!

ये कैसा जीवनसाथी मिला है

ये कैसा जीवनसाथी मिला है,

जिसके बारे में सोच कर,

मन को इतना सुकून मिलता है,

हमने तो उलटा ही देखा था अक्सर,

लोग अपने पति और प्रेमी से बचबच कर भागते है

और वो तो कीचड़ से लथपथ सड़क पर हमारे पैरों की धूल पत्ते तोड़ कर उनसे रगड़रगड़ कर साफ़ करता है,

हमारे नाख़ून घिसना चाहता है,

अब इस संगी को मात्रपित्र से मिलाने में कैसा संकोच,

यही की वो बस उम्र में हमसे थोड़ा छोटा है,

पर ख़ूबियाँ उसमें ऐसी है

मानो सों जीवन जी कर उसने सीखा हो जीना,

जैसे हर दिन कईकई बार उसने जीए हो,

और उसे पता चल गया की क्या करना है हर एक वक़्त

उसके आलिंगन के बारे में सोच कर ही मन रजनीगंधा के फूलो की तरह महकने लगता है,

नहीं वो रजनीगंधा नहीं जो कल की पिक्चर में उस हीरोईन की मेज़ पर सजे थे एक काँच के मर्तबान में

एक पल वो किसी के सपने देखती थी,

तो दूसरे ही पल किसी और के,

असली रजनीगंधा की बात कर रही हूँ मैं,

जो जब क्यारियाँ भर दे तो लगे की वही अप्सराओं का निवास होता होगा,

वरना तो इतनी सुंदर, भीनीभीनी ख़ुशबू से कौन किसको रिझाने की कोशिश करेगा|

इन्द्रधनुष!

जैसे शांख होती है ना बिना पत्तो के,

जैसे सर्दियों में माटी होती है, बारिश के इंतजार में,

जैसे पत्तझड़ में धरती होती है सूखे पत्तो से पटी,

पर सूरज से वंचित,

जैसे पूर्णिमा के चाँद पर बादल छा जाता है कभी-कभी,

जैसे मछली होती है पानी के बाहर,

ऐसा ही है मेरा अस्तित्व तुम्हारे बिना,

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मेरे मन का चंदन दर्पण

बस कुछ ही पल लगते है,

जैसे कुछ ही पलो में हवाई जहाज़ बादलों के बीच में पहोच जाता है,

वैसे ही कुछ ही पलो में जीवन में कुछ भी बदल सकता है,

हम ख़ुद को पंख दे कर उड़ा भी सकते है,

और ख़ुद को वज़न से पाताल की गहराइयों में खींच भी सकते है,

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तुम

वो पिछली सुबह जो एक बूँद मोती की तरह  बैठी थी ना पत्ते पर,

याद है तुम्हे?

जिसे घूँट भर पी लिया था मैंने,

जाने कैसे एक बूँद से प्यास बुझी थी?

मुझे लगता है तुम वही बूँद हो!

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एहसास

तेरी ख़ुशबू है आती अभी तक मेरी रूह से 

तेरे स्पर्ष का है एहसास बाकि अभि

तेरे हाथों की गर्मी को महसूस करती हूँ मैं

तेरे होंठो की नर्मी एहसास भी गया नहीं

बालों मे हर सनसनाहट का तू ही जिम्मेदार है  

होंठो के कपकपाने की वजह भी है तू ही 

उन सुन्हरी सुबहों मे साथ तु था जब 

मुस्कुराती हुई आती थी किरने भी  

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चाँद

जब कोई चिड़िया चहकती है,

सूरज उगता है,

हवा चलती है,

तभी मेरी क़लम भी थिरकती है,

जब सुबहसुबह प्रक्रति शृंगार करती है,

मैं उसको निहारती हूँ,

पानी में तैरते हुए,

या तैरने की कोशिश करते हुए,

ऊपर आसमान में अपनी नज़रें फिराती हूँ,

बादल उड़ते नज़र आते है,

रूयी जैसे हल्के बादल,

हल्के-सफ़ेद, हल्के-नीले, हल्के-स्याह,

भागे चलें जाते है,

दूरदूर उन लोगों की पुकार पूरी करने जो उनहें चाहते है,

जिनको रोटी नसीब नहीं होगी या प्यास से उनके गले और होंठ सूख जायेंगे!

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बचपन

शब्द ही है जो कभी कभी नज्में बनते है,

नज्में ही है जो कभी कभी कुछ याद दिला देती है,

यादें ही है जो उस वक़्त को ज़िंदा रखती है।

एक खुशनुमा बहार जैसा वो वक़्त,

एक ठंडी बौंछार जैसा वो वक़्त,

एक मीठे अमरुद जैसा वो वक़्त,

कभी आधा कच्चा लगता है,

कभी आधा पक्का।

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