हिमाचल प्रदेश के अदभुत मंडी शहर में हम: और वहाँ व्यतीत किया हमारा कुछ समय
हम व्यास नदी पर है।
ये हिंदी का प्यार आज छूटता ही नहीं है। जबसे वो हिमाचल प्रदेश कि हिंदी दसवीं कक्षा की किताब पढ़ी है मन करता है सब हिंदी में ही लिखने को। और क्यूँ ना करें? हिंदी मेरी मात्र-पित्र की भाषा है।
और हम है भी ऐसी जगह। हम है मंडी में, इस छोटे से हिमाचलि शहर को छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है। बहुत मंदिर है यहाँ। पुराने, नए, सब तरह के मंदिर। मेरे पति—जिन्होंने कहा था हम यहां आएँगे—बताते है कि इस हिमाचलि काशी में लोग कुछ १२-१३ सदी में बस गए थे। बहुत पहले से इंसान रहते है यहाँ।
जबकि मेरे होटेल में सफ़ायी वाली बताती है की उसके सामने ही इस नदी के तट पर कोई ख़ास घर नहीं थे। जंगल था यहाँ। अब मैं अपनी बालकनी में खड़े हो कर देखती हूँ तो मुझे घर ही घर दिखते है सामने। ऊँचे, बड़े, लम्बे, छोटे घर। सबकी छत कुछ टेढ़ी है, जैसे होती है हिमाचल के घरों की। ऊपर एक रिसॉर्ट भी दिखता है, पर उससे ज़्यादा कुछ नहीं|
बराबर बराबर एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाए खड़े है ये घर। बीच में एक इंच जगह भी नहीं दिखती नदी के इस तट पर। जगह होगी ज़रूर। घरों के आगे पत्थरों से पटा है नदी का किनारा। तट कह सकते है उसको। बड़े छोटे सब प्रकार के पत्थर दिखते है वहाँ। जे़ सी बी मशीन भी काम कर रही है तट के बिलकुल पीछे जिससे पता चलता है कि पहाड़ का और हिस्सा कट कर नदी पर और मकान या दुकान बनने वाले हैं।
तो यानी देखते ही देखते घरों से भर गया ये जंगली तट। हमारी ओर होटेल है ज़्यादा क्यूँकि हम हाइवे पर है। सड़क की इस और लम्बे लम्बे होटेल हैं। हर तरह के कमरे है इन होटलों में। मनाली तक जाता है ना हाइवे तो आवागमन लगा रहता होगा यात्रियों का। इसलिए होटेल खुल गए है सब।
परंतु सफ़ायी वाली बताती थी की ये सब इधर की ज़मीन बाहर के लोगों ने ली है, मंडी के नहीं है ये लोग जो शहर से दूर नदी किनारे आँ कर बसे है। कोई सर का घाट से है, कोई रिवालसर से, कोई कहीं और से, कोई कहीं और से।
बात तो ठीक मालूम पड़ती है। शहर के लोग तो शहर में ही है, और बाहर के लोगों को जहाँ जगह मिली, वही फैल गएँ।
बात ये भी फिर ठीक है की मेरे सामने के सूखे वृक्षों पर तोते, नीली मैगपायी, कव्वे, चील सभी आ कर बैठते हैं। भाई घर तो ये पहले उनका ही था। हमने तो हथिया लिया। उन सूखे पेड़ों के तनो से चोंच से खोद खोद कर क्या निकालते है ये तोते, कौन ही जाने।
गुड़सल भी है बहुत भाई कहना ज़रूरी है नहीं तो लड़ पड़ेगी हमसे।
आज तो शनिवार का दिन हो गया।
हम आए थे यहाँ बुधवार की शाम को। कहा से? रिवालसर से।
सुबह के चलें हमने पहले एक तिब्बती रेस्टोरेंट में खाना खाया, फिर गुरुद्वारे गए, फिर वापस कमरे में गए, वहाँ से सामान लिया, निकले रास्ते पर, फिर वहाँ से कुंती ताल गए, बड़ा सुंदर मंदिर था वहाँ एक। वहाँ से उनके एक गाँव वालो के घर में गए, अखरोट लिए, वही से घूँमे इधर उधर, एक सुंदर हनुमान मंदिर भी देखा, एक कुंती मंदिर भी देखा, फिर वहाँ से निकल पड़े बारिश में ही, और पहुँचे मंडी कुछ शाम को ७ बजे शायद।
२-३ होटेल देखें लेकिन कुछ पसंद नहीं आया। रिवर बैंक होटल देखा, ध्रुव होटल देखा, एक हमारे श्रृंगार होटल के बग़ल में देखा जो गंदा लगा। उसको देखा और निकल लिए। रिवर बैंक तो फ़ुल था। ऐसी क्या बात है वहाँ कि वो फ़ुल था? पता नहीं।
हम सोच रहे थे नदी के तट पर लेंगे एक कमरा, छोटा सा हमारा आशियाना। हुआ वही, होता है वही, हम दोनो जो ढूँढते हैं कमरा तो मिलता है वैसा ही जैसा चाहिए।
यहाँ श्रृंगार में देखें कई कमरे। पहले तो उन्होंने नीचे नीचे के कमरे दिखाएँ जो या तो सड़क को देखते थे या फिर उनके सामने दूसरी एक खड़ोंजे जैसी बिल्डिंग थी। हमने पूछा की कोई कमरा नदी के सामने वाला दिखा दो भाई।
तो वो बंदा हमें ले आया नीचे की और। वहाँ पर उसने हमें एक कमरा दिखाया, या शायद दो कमरे दिखाएँ।नदी के पास वाला कमरा हमें अच्छा लगा।
हुआ यो की उस वक़्त गरमी थी बहुत और हम थे लहलहाते हुए पसीनों में। नदी भी थी पीछे तो उसकी उमस भी थी बहुत। हवा पानी से सराबोर थी। मौसम भी था बारिश का तो पानी था हवा में बहुत उस कारण भी।
हमें लगा कमरे का किराया पता नहीं कितना होगा। जो मैनेजर बैठा था उसने बताया की किराया कुछ १३०० था बिना एसी का और एसी वाला था १५०० का।
ये तो महँगा पड़ेगा, हमने सोचा। अभी तो हम आ रहे थे एक ६०० रुपए वाले कमरे से। दरअसल गंदा था वो कमरा काफ़ी पर मैं आराम से कह सकती हूँ की ६०० में हिमाचल में अच्छे साफ़ कमरे भी मिल जाते हैं।
जंजैहली में हमने ७०० में साफ़ कमरा लिया था बिलकुल जो वैसे हमें ६०० में मिलता।
हमने पूछा: “एसी की ज़रूरत पड़ेगी क्या? गरमी तो है शायद, ऐसा लगा।”
गरमी थी भी। हम चल फिर कर जो आए थे। ऊन सज्जन ने कहा: “एसी नहीं लगेगा आपको। महँगा पड़ रहा है तो बिना एसी का कमरा ले लो।” १२०० में लगाया उन्होंने कमरा एक दिन के लिए।
हमने इतनी जद्दोजहद एक दिन के लिए इसलिए की क्यूँकि हम अधिकतर लम्बा रह जाते है। उस रात तो जब तक हम कमरे में गये अँधेरा हो चुका था।
पर फिर हम सोएँ आराम से काम करके और सुबह के लिए पौने पाँच का मेरा अलार्म बजता है जाने क्यों।
अलार्म बजा और बजता रहा। मैं उठ गयी, होशोवास नहीं था ज़्यादा कुछ लेकिन। बाहर धुँध सी छायी थी। सुबह उन दिनो होती भी थी और नहीं भी। सूरज नहीं निकलता था ना बादलों के पीछे से। सावन का महीना था।
अलार्म और भी थे कई और वो बजते गए और मैं सोती गयी। उठती रही, सोती रही, बाहर झाँकती रही।
मेरे पति, जो बराबर में सोए पड़े थे, बाद में मुझे बताते है की कई बार मैंने पलंग पर लेटे लेटे सर उठा कर नदी की ओर झाँक कर पूछा और बड़-बड़ की कि “नदी नदी,” देखा उसको, और फिर सो गयी।
मुझे विश्वास है उनकी बात का।
अक्सर मुझे इस बात का एहसास काफ़ी होता है की एक स्त्रोत है। बस फिर मैं उसको महसूस करते करते जागती सोती रहती हूँ।
उठी तो पता नहीं कब, लेकिन जब भी उठी, उठ कर टॉयलेट गयी। दिन था बृहस्पतिवार का अब।
टॉयलेट में पानी नहीं फ़्लश कर पा रहा था ढंग से तो बाहर गयी घबरा कर। क्या करूँ, क्या करूँ, ऐसा सोचा।
पति से बात की। उन्होंने अंदर जाने का उत्साह दिखाया। काफ़ी साहसी है वो। मैंने वो सारे उत्साह को उतनी ही तेज़ी से दबा दिया और कहा की मैं फ़ोन करती हूँ होटेल वालो को वो करेंगे इंतजाम।
किया फ़ोन और अपनी समस्या बतायी। उन्होंने कहा मैं एक और कमरा खुलवा देता हूँ आप उसका टॉयलेट इस्तेमाल कर लीजिए।
पर हमें दिन में भी तो टॉयलेट चाहिएगा? ऐसा मैंने कहा। ये बता कर की हम दो दिन और रुकेंगे। ये आश्वासन पा कर की कोई आएगा, जो हमारी समस्या को हल कर देगा, मैं बाहर बालकनी में बैठ गयी।
तब आया एक लड़का तुरंत। उसने जब तक बाथरूम देखा सब कुछ लगभग साफ़ हो चुका था, मेरे पति ने बताया। मैं तो उधर झाँक भी नहीं रही थी।
धीरे धीरे टिश्यु पेपर गया था टॉयलेट बोल के अंदर, बस यही समस्या थी। विभिन्न प्रकार की टॉयलेट सीट थी वो।
चेहरे पर मेरे हँसी आयी। ज़्यादा ख़ुशी इस बात की थी की टॉयलेट ज़्यादा गंदा नहीं देखना पड़ा किसी और को मेरी वजह से।
पर अब उस टॉयलेट को इस्तेमाल कैसे करें जिसमें गंदगी का ऐसा तांडव देखा हो?
कमरे तब तक खुल चुके थे आसपास के। उनमें झाँक कर देखा। २-३ नदी के सामने वाले कमरे दिखें। एक तो बेकार लगा बिलकुल।और एक मुझे पसंद आया।
वो कमरा बिलकुल हमारे कमरे के बराबर में था। जगह में शायद हल्का सा छोटा लेकिन उसकी बालकनी मुझे और बड़ी महसूस हुई। उसमें पुराने कमरे की तरह आड़ी टेढ़ी बालकनी नहीं थी। ना ही साथ में लग कर एकदम एक बड़ी खड़ोंजे जैसी बिल्डिंग खड़ी थी। ये वाली तो लम्बी और चौड़ी बालकनी बिलकुल नदी के सामने थी।ना कोई बायें की बिल्डिंग दिखती थी, ना दाएँ की।
हमें गाड़ी की सर्विस करानी थी और ऐसा मालूम हुआ की सारा सामान भी उसमे आराम से आ जाता। मैनेजर ने पहले ही मना कर दिया था कि और कोई भंडार कमरा नहीं था जहाँ हम सामान रख सकें।
सब साफ़ था। पति को भी मनाया और सारा सामान ले कर हम शिफ़्ट हो गए। गंदी टॉयलेट पीछे छोड़ कर।
दो दिन के लिए वो कमरा लिया और जब नीचे बात करने गए तो उन्होंने कहा: “१२०० से नीचे तो बिलकुल नहीं दे सकते। इतना भी इसलिए दे रहे है क्यूँकि अभी सीज़न ही नहीं लग रहा कोविड की वजह से। नहीं हो पाएगा।आप और कोई कमरा ले लो जिसमें नदी का व्यू ना हो।”
मैंने अपने पति से बात करने का ड्रामा किया और हमने उनको बोला की हम नया कमरा लेंगे वही नदी वाला १२०० में २ दिन के लिए।
इस दिन हमने जब काम शुरू किया तब समझ ही नहीं आया की पतिदेव बैठेंगे या चलेंगे। तो हम लोग काम करते रहे और लगभग जब २ बज गए और भूख असहनीय हो गयी तब लगा की अब डाँट लगनी पड़ेगी। तो लगायी भी। और फिर हम तैयार हुए और फिर निकल पड़े गाड़ी ले कर। पहुँचना था चावला के यहाँ। फ़ोन लगाया तो पता चला की मछली मिलेगी वहाँ।
बस फिर क्या था। मैंने अपने फ़ोटो ब्लॉग का काम—हिमाचल की कुछ १०१ फ़ोटो का काम—रोका और निकल पड़ी। वहाँ हमने मछली खायी फ़्राइड जो आयी फ़्रेंच फ़्राई के साथ।और बीयर भी पी। नदी तो उनके यहाँ से भी दिखती थी।
फिर हम वापस गये थोड़े ड्रंक ड्रंक।चद्दर बिछा कर दरवाज़े के पास कमरे में अंदर लेट गए हम।अंदर से सब दिखता था पर बाहर से हमें कोई नहीं देख सकता था।
हैं ना जन्नत?
उस दिन शायद और किताब पढ़ी होगी और काम किया होगा लेकिन याद नहीं। थोड़ा सा सामान निकाला गाड़ीं से क्यूँकि सर्विस पर देनी थी। शाम को हमने सूप पीया था और पतिदेव ने नान खायी थी।
सो गए जल्दी और फिर अगले दिन सुबह जल्दी उठे और मैंने किया थोड़ा नाटक। नहाए धोए, मैंने हाथ पैर खींचें अपने, फिर हमने रेसलिंग की। करते हैं हम कभी कभी एक दूसरे की ताकत आजमाईश के लिेए।
बात तो पूरे दिन बाहर रहने की थी लेकिन हम गए कैफ़े आरमेलिया या ऐसा कुछ। वहां लिया मशरूम दो प्याज़ा मैंने और २ टोस्ट ब्रेड और सागर ने लिए एक बर्गर पनीर का।खाते रहें और मैं फ़ोटो वाले आर्टिकल पर काम शुरू कर के अपना लिंक वाला काम करने लगी।

मंडी का बाज़ार काफ़ी भीड़ भरा था। बड़ी मुश्किल से पार्किंग मिली थी वो मंदिर के सामने। २ घंटे को बोली थी उसने और फिर हमने लगभग ३ से ५ घंटे लगाए रखी गाड़ी। वापस होटल गये क्यूँकि सागर की तबियत ख़राब थी।
आ कर कमरे में काम करने लगे। करते रहे। शाम को बाहर कुछ लाइट खाने गए। दा मोंक कैफ़े या ऐसा कुछ नाम था उसका। साउथ इंडियन जगह थी। लेकिन समझ आ गया था कि नोर्थ इंडियंस चला रहे थे।
मंडी में पैसा बाक़ी हिमाचल की जगहों के मुक़ाबले ज़्यादा था तो वहाँ ख़रीदारी भी ज़्यादा होती थी और पैसा व्यय भी ज़्यादा होता था। वहाँ पर काफ़ी लोग मंडी के लोकल ही थे। एक दूसरे को जानते भी थे काफ़ी लोग।
मैंने एक दोसा बोला और पति ने भी और एक सूप जो मिला नहीं तो फिर एक गोभी मंचूरियन लिया हमने। वो खाया नहीं और लगभग पूरा पार्सल कर कर ले गये जिसको फिर हमने अगले दिन फेंक दिया। खाना ठीक सा था। जो साउथ इंडिया में दोसा खाता है उसे कैसे ही उत्तरी भारत का दोसा पसंद आएगा? मंचूरियन भी ख़ास नहीं था लेकिन। क्रिसपी नहीं था उतना।
वापस गये तो फिर बैठे एकांत में। काफ़ी देर हो चुकी थी, लेकिन मैने अपना न्यूज़लेटर लिखने के बजाय किताब पढ़ी। मज़ेदार किताबें रोज़ पढ़ने से ही मेरी गाड़ी चलेंगी।
जब मैं पढ़ती हूँ लेखको की कहानियाँ जैसे वो खीरें वाली पढ़ी थी उस दिन, फिर वो १०० ड्रेस वाली, वो चेखोव का प्ले, वो मनु शर्मा की पर्सनल दास्तान पूरी झाँसी की रानी टाइप्स, वो लड़की के बारे में जो बस में घूम आयी थी शहर, सीगल वाली कहानी, ऐसी और कई पढ़ी और इनके नाम मैं किताबों में से ही ले सकती हूँ, तो उत्साह मेरे अंदर भी आया। मैं अकेली नहीं हूँ जो दिन रात अपना सर ख़राब करती है किताबों में। और सबसे बड़ी ये बात की छोटी छोटी बातों पर फ़ोकस कर कर ही बनती है कहानियाँ।
सुबह उठे ना तो जल्दी ना देर से, और पति देव की तबियत अब बेहतर थी। कल तो उन्हें बुखार था, और मैं पैदल दवाई लाने गयी थी।
तैयार हो कर हम इधर उधर बैठे। मैंने नदी देखी।
नदी की कहानी बताती हूँ।
सुबह से अगर कैमरा ले कर बैठ जाओ—क्यूँकि कैमरा मैं गाड़ी में से निकाल लायी थी बाक़ी सामान के साथ—तो मज़ा आता है बहुत।
पति देव सोये थे या जागे थे, नहीं पता। पर मेरा उत्पाद चालू था। मैंने कुछ अधबुध देखा तट पर।
लोग कई सारे थे नदी किनारे। बारिश थोड़ी सी देर पहले ही रुकी थी। मुझे लगा घुमने गये होगे सब लोग।एक आदमी अपने कुत्ते के साथ था। दो और लोग थे अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ।
वो दरअसल गए और धीरें धीरें सब अपने कपड़े उतार कर, पेंट नीची कर बैठ गए झाड़ियों के पीछे। मैं देखती रह गयी।एक बच्ची बीच में उठी और फिर बैठ गयी। एक आदमी उससे थोड़ी सी दूर ही बैठा था। पीछे जे़ सी बी मशीन अपना काम कर रही थी।और उस वक़्त नदी तेज़ बहाव से बह रही थी।
आगे जा कर हमारे होटेल से नदी बल लेती थी। उस बल का जो हिस्सा हमें दिखता था उसके ऊपर पहाड़ था, कटा हुआ सा। वहां तक घर से थे। सामने की तरफ़ गुरुद्वारा आ जाता था। पर कुछ हिस्सा खुला था बीच में।
वही, उसी खुले हिस्से में थे वो लोग।
इतनी गंद थी वहां ये तो मैंने देखा था। पहले दिन नदी किनारे देख कर मैं ये भी समझ गयी थी की वहाँ इंसान आते जाते थे अपना कार्य करम करने। मैं गयी थी ना तट तक देखने जब दवाई लेनें गयी थी। २ ही मिनट का रास्ता था होटेल से।
फ़ोटो भी लिए मैंने पर उनका कोई काम नहीं। मैं इस्तेमाल करूँगी ऊन तस्वीरों का सिर्फ़ लिखने के लिए। आसमान तो भरा था सलेटी सलेटी गहरे बदलो से। तोते उड़ रहे थे बहुत।
सामने के सूखे पेड़ों पर बैठ कर कुरेद भी रहे थे तनो को चोंच से। खाते थे उसमें से। जंगल ही तो था वो सब पहले, अभी तो वहां इतनी आबादी हुई। चील भी बैठी थी एक आ कर।
नदी की हमेशा आवाज़ आती थी हमारे कमरे मे। उस आवाज़ में और कुछ नहीं सुनायी देगा। कई बार हम अपनी ही आवाज़ नहीं सुन पाते थे अगर धीरे बोले तो।
सब कुछ देख मैं अचंभित थी। ऊन लोगों ने किसी लोटे या बॉटल का इस्तेमाल नहीं किया ख़ुद को साफ़ करने के लिए। बल्कि सीधे नदी पर गए और वही पानी से ख़ुद को साफ़ करने लगे। उस आदमी ने अपनी बच्ची को उलटी तरफ़ से बैठाया और सीधे नदी से पानी उस के ऊपर डाला।
ख़ैर। नीचे एक सफ़ेद नदी और ऊपर एक सलेटी आसमान मुझे मनोरंजित करते रहें। फिर हम तैयार हो कर निकले और भीड़ भरे बाज़ार में गए खाना खाने। मुझे खाना तो मंडयाली धाम था—जो वहाँ के लोकल बोलते थे की सिर्फ़ शादियों में बनता है। सुबह सफ़ायी वाली ने सफ़ायी भी की थी जिसके बाद मैं बहुत थका हुआ महसूस कर रही थी।
इंडिया के होटलों में सफ़ायी करवाना भी बड़ा भारी काम है। पूरी निगरानी रखनी पड़ती है क्यूँकि कुछ ना कुछ तो गंदा रह ही जाएगा। और अगर तुम मेरी तरह हो, जिसे धूल से ऐलर्जी है, तो फिर तुम गए। गंदा दिखा नहीं की मेरे कान खड़े हुए।
होटेल से चलें तो मन में था धाम, या फिर छोले भटूरे। उस भीड़ भरे बाज़ार में कुछ आसानी से नहीं मिलता था। मुश्किल से पार्किंग हुई। फिर हमने एक समोसा और एक कचौरी ली और ख़ुद को किसी भी तरह तृप्त नहीं पाया। फिर हम निकले और ढूँढने लगे धाम। उस गोल चक्कर के चारों तरफ़, गलियाँ इधर उधर, नहीं मिला। एक जगह में बैठे जिस पर चना पूरी लिखा था पर वहाँ बनता नहीं था। बाहर पोस्टर क्यूँ लगाया फिर? मैंने पूछा। उसने बोला: “वो तो ऐसे ही।”
उसे कोसते हुए मैं गयी बाहर। ढूंढ फिर जारी। फिर से एक दुकान दिखी जहाँ छोले भटूरे थे। वहाँ गए। पूछा था तो थे।एक भटूरा आया एक प्लेट में और थोड़ा सा चना। ठीक सा था। उसके साथ गोल गप्पें भी लिए। ये और वो कोने वाली दुकान कचौरी वाली, एक ही लोगों की थी।

पता नहीं उन पर इतनी भीड़ क्यूँ थी। इतना कुछ ख़ास नहीं था खाना। ये सब खाने के बाद सोचा: गाड़ी दी जाए सर्विस को।
गाड़ी दी तो सही और निकल कर आए पैदल तो जनाब ने उलटी दिशा में मोड़ दिया। बारिश तो हो ही रही थी हल्की-हल्की।
लगभग १ किलोमीटर चलें और चाय पी एक जगह असली फूल देख कर पानी में एक गिलास में अच्छा लगा। ख़ुशबू नहीं थी लेकिन।
वहाँ से वापस आ कर मैंने धरना दे दिया बालकनी में।
समय अभी भी वहाँ अदभु़त था।
नीचे सफ़ेद सी नदी जिसके ऊपर पानी की वाष्प एकत्रित थी मानो हल्की हल्की बादल जैसी वाष्प। शायद पानी ठंडा था और हवा गरम और इसलिए पानी थोड़ा उड़ रहा था? पता नहीं।लोग अब भी थे एक-आध तट पर गंदा करने। पर अब मेरा ध्यान था तोतों पर। हरे-हरे कितने ही तोते एक बड़े झुंड में आ कर बैठे सूखे पेड़ पर। अब तो बादल भी थे बहोत, वही भरे-भरे घने से, और उनके बीच में से रोशनी का एक गुल्लक जैसा सूरज ऐसे चमक रहा था, दिख नहीं रहा था, चमक रहा था बस| चाँदी की तरह।
चाँदी की ही अँगूठी मेरी गाड़ी सफ़ायी वालों ने निकाल कर दी।
फिर उन तोतों को देखती रही। घर पर भी बात की थी। उनकी रक्षा बंधन की बातें ही ख़त्म नहीं होती।
तोतों की कहानी तो अलग लिखी है मैंने। वो नीली मैगपाई भी उड़ रही थी। एक दो चील भी आयी पार्टी में मज़े लेने। गुड़सल भी थी और कव्वे भी। नीचे एक बगुला बैठा था लाल-भूरे से बड़े पतथरो के नीचे ध्यान लगा कर। जैसे हमें पता ही नहीं वो क्या कर रहा था।
सामने थोड़ी देर में लोग आए तो मछली पकड़ रहे थे। कोशिश तो जारी थी, धागा ले कर लटकाया था। मैंने देखा। ख़ूब फ़ोटो ली चारो तरफ़ की।
सपना सा था ये दृश्य। कहाँ सामने सफ़ेद झाग वाली नदी बिलखती हुई ज़ोर से, और ऊपर बाद़लो की बारात, एक बगुला उधर, तो एक चील इधर, तोतों के झुंड, मस्त नीली मैगपाई चहक-चहक, और इन सबके बीच में मै, ठंडी हवा का झोंका लिए, किताब हाथ में, हवा गालों पर, जीवन के मज़े लेते हुएँ।
मैंने निर्णय किया की मैं ऐसे ही दिन बिताऊँगी और मैंने वैसे ही बिताया। कही नहीं गई और रात को मशरूम हांडी खाया और अब लिख रही हूँ।
फिर वो वाष्प ग़ायब हो गयी थी और तेज़ बहती हुईं नदी सामने दिख रही थी आराम से। धीरें धीरें अंधेरा होने लगा और शाम को मंदिर मे पुजारी पूजा करने आया| घंटियों की आवाज़ उसी सेम टाइम पर मुझे रोज़ सुनायी देती थी। फिर और थोड़ी देर में वो मछली पकड़ने वाले भी ग़ायब हो गये और सारे तोते भी उड़ गए। मैं भी अंदर आ गयी।
बाद में देखा तो नदी एकदम अंधेरे में काली सियाह दिखायी पड़ती है। बस बत्तियाँ चमकती है उसके इधर उधर जो सितारों जैसी लगती है पर वो होगी दरअसल घरों की बत्तियाँ।
सितारें तो दिख नहीं रहें, बस है बत्तियाँ| और अब बत्तियाँ बुझा कर सोने का टाइम आ गया है।
शब्बाखेर।
तो बात कुछ यूँ हुई की शनिवार का बखान तो मैंने किया। फिर आया रविवार। अभी सोमवार है, सुबह के ११ बजे है।
मन तो विचलित रहता है मेरा पर मुझे उसको बढ़ावा नहीं देना है ज़्यादा। धीरें धीरें काम कि गाड़ी आगे बढ़ती है। सुबह-सुबह वैसे तो सबसे ज़रूरी काम करना चाहिए पर मैंने आज शुरुआत की आर्टिकल्ज़ पढ़ने से जो खुले थे मेरे लैपटाप पर| क्या नाम था उस पेंटर का? देखो मैं भूल गयी। Artemisia Gentileschi।
Artemisia Gentileschi। की कहानी ये है की वो इटली की एक पेंटर थी जो १६ शताब्दी में जीवन में आयी और अपने काम को ले कर प्रसिद्ध रही।फिर लोंग उन्हें भूल गए और २० शताब्दी में फिर उनके बारे में बात होने लगी। अधिकतर एक लेख ही काफ़ी होता है फिर से एक पेंटर को ज़िंदा करने के लिए।
उस पेंटर का रेप हुआ था और लोगों का ऐसा मानना था की उस घटना से उनकी काफ़ी पेंटिंज़ प्रभावित है। जैसे एक औरत एक मर्द को मार रही है या फिर उसका कटा हुआ सिर टोकरी में रख कर ले जा रही है या कपड़े में लपेट रही है। उसने बहोत तसवीरें बनायी, अधिकतर लोगों की और उनकी शक्लों की। वो रोशनी और छाया के अपनी पेंटिंग में इस्तेमाल के लिए काफ़ी प्रसिद्ध थी क्यूँकि वो उसको बहोत ही सम्पूर्ण तरीके से सम्पन्न करती थी। शायद इटली मे नेपल्स में आए प्लेग में उनका निधन हुआ।
उनके जीवन के बारे में पढ़ कर मुझे ये महसूस हुआ की अपने जीवन काल की सोशल और पोलिटिकल समस्याओं की बात किए बिना कोई भी कलाकार पूरा नहीं है। और लोग जब कलाकारों की बात करते है तो उनमें सबसे ऊपर वो आते हैं जो सबसे ज़्यादा समाज को ले कर जागरूक रहें। और जब भी एक विश्लेषण आता है एक कलाकार का तो ये बात ज़रूर होती है की उसने किस चीज़ पर काम किया या क्या मुद्दे उठाए।
उसके बारे में पढ़ा मैंने। और Amy Chua: एक येल लॉ स्कूल की प्रफ़ेसर जो अपने घर पर डिनर पार्टीज़ करती थी जिसमें स्टूडेंट्स को शराब सर्व होती थी। उसका पति योन शोषण के लिए कंडेम्ड था। उसे कॉलेज २ साल के लिए बिना सैलैरी के रस्टिकेट कर चुका था। इस प्रफ़ेसर का एक फ़ोन बच्चों को स्कॉलरशिप दिला देता था, सुप्रीम कोर्ट के जज के यहाँ भी।
पर उस औरत का, जो अप्रवासी चायनीज़ माँ बाप को पैदा हुई थी अमरिका में, काफ़ी रुझान था अलग-अलग जातीयता के लोगों के प्रति। उसने बहुत से ऐसे बच्चों की मदद करी जो बाहर से आए थे या अमरिका में ही अप्रवासी थे और मुश्किल से येल तक पहुँचे थे। शायद कूल बनने के लिए उसने ऐसी पार्टियाँ रखी और शायद कभी अपने पति को भी कुछ नहीं कहा योन शोषण को ले कर पर उसको बढ़ावा ही दिया स्टूडेंट्स को घर बुला कर, शराब पिला कर, और एक बार ये भी कहा गया कि उसने बच्चों को डाँटा जो उसके पति को आलोचना कर रहे थे ये कह कर की वो किसी सुप्रीम कोर्ट जज के यहाँ उनको नहीं लगने देगी।
हर तरह के लोग है दुनिया में। उसकी क्या दुनिया रही होगी की उसके मन में इतनी संवेदनशीलता थी बच्चों को ले कर| पराए बच्चों को ले कर जिनहें उसने बहुत ही सहनशीलता और लगन से मेंटर किया। जबकी वो ख़ुद एक बहुत ही टाइगर मोम जानी जाती थी, यानी की वो मोम जिसने अपने बच्चों को बचपन से बहुत धक्के दे दे कर उको म्यूज़िक प्रॉडिजी बना दिया और खिलाडी़ भी और उन्होंने हॉर्वर्ड जैसी संस्थानो में पढ़ायी भी की। वो बच्चों के सॉफ़्ट टोयेज़ जला देने और कुछ और शंकास्पद तरीक़ों से बच्चों को मेहनत करने के लिए मजबूर करती थी।
शायद एक अजनबी देश में अपनी एक पहचान बनाने की उनकी जद्दोजहद और खवाईश ने उसको ऐसा बना दिया। सबसे मेहनत करवायी क्यूँकि उसे वही एक रास्ता दिखा पहचान बनाने का।
ख़ैर।
किससे तो आज सुना रही थी सफ़ायी वाली।
उन्होंने कहा कि अलग अलग तरह के लोग आते है कमरों में। कुछ बाहर से जो आते है उनको तो सफ़ायी करवानी ही होती है। मुझे उलटा लगा था।
लोकल जो होते है उन्हें नहीं करवानी होती क्यूँकि उनको डर होता है शायद कि उनका कोई जान-पहचान वाला ना निकल जाए। तो एक जोड़ा आया था जो बालकनी में बस रात को अन्धेरे में बैठता था।
दो जोड़े और थे जो बहुत समय बराबर वाले कमरे ले कर लड़ते ही रहे। उसमें दो भाई थे शायद। एक भाई ने दूसरे को और उसकी बीवी को गाड़ी से उतार दिया बस स्टेशन पर।
ऐसा तो होता है।
होटेल में सफ़ायी कराना भी एक बड़ा काम है। फिर वो आपस में ये भी डिस्कस करते है, होटेल का स्टाफ़, मेरा मतलब है, की कौन शादीशुदा है और कौन नहीं।
जिन जोड़ो में लड़का सब कुछ करने को तैयार है जो लड़की कह रही है वो शादीशुदा नहीं है। वैसे सब पति भी इतने ख़राब नही होते, उसने कहा। फिर बोली लड़का लड़की कैसे घूमने जाते है हमें भी पता है। बोलती है मेरा भी एक फ़्रेंड है जिसके साथ मैं जाती हूँ।मैंने उस बात को कुछ ख़ास नहीं कुरेदा। पर मुझे पता है की यहाँ पर फ़्रेंड बॉयफ्रेंड को या सेक्स पार्ट्नर को बोलते है।
वही तो बात है। सीधे से बहुत ही पारिवारिक दिखने वाले लोग कई बार बहुत ऐसी चीज़ें करते है जो हम सोचेंगे नहीं। वो ऐसी चीज़ें नहीं है जो बहुत ही क्राइम पार्ट्नर दाऊद इब्राहिम टाइप्स पर फिर भी समाज से हट कर चीज़ें।
कल रविवार की कहानी बताती हूँ।
सुबह को नहा धों कर, एक कप चाय पी कर हम लोग सफ़ायी के बाद निकल गए बाहर। कल रक्षा बंधन था तो मेरे पति ने फोन किए बहनों को और मैंने थोड़ा ध्यान लगाया बालकनी में बैठ कर।
फिर नहाए और चलें।

कल इनको पता था कहा जाना है तो इन्होंने मुझे मंदिरों के नाम दिए।
भीमकाली मंदिर एक सफ़ेद बिल्डिंग है जो रात को भी उज्जवलित दिखती है। हमने कई बार उसको मंडी से अपने हाइवे होटेल की तरफ़ जाते देखा था लेकिन कभी ध्यान नहीं लगाया था कि वो क्या है। उसके बराबर में एक बहुत बड़ी पार्किंग की बिल्डिंग को देख कर मैंने सोचा था की वो एक होटेल या रिज़ॉर्ट है।
यह कुछ ख़ास अच्छे होटेल नहीं है तो हमने ज़्यादा रूचि नहीं ली उस सफ़ेद बिल्डिंग में पहले। वो रस्ता उधर से ही आइ आइ टी मंडी जाता है। और आगे पराशर को भी जाता है।
तो हम वो व्यास के ऊपर पुल ले कर उस तरफ़ गए और गाड़ी को बाहर लगा दिया। भीमकाली मंदिर लगभग १५ शताब्दी में बना था। यह पांडवों की बड़ी कहानियां है—मतलब हिमाचल और मंडी में। मंडी में ख़ासतौर से।
बाहर तो हमने कहानी पढ़ी ही और वो लिखी हुई मिल जाएगी बोर्ड पर। पर ऊपर जब हम गाए तो बीच में काफ़ी मूर्तियाँ शेर की और इसकी उसकी दिखाई दी। पहले वहाँ पर बस एक मूर्ति ही हुआ करती थी| फिर उस पुराने मंदिर को तोड़ कर एक नया मंदिर बना दिया गया। भव्य मंदिर। हम अंदर गए जूते उतार कर और मंदिर की परिक्रमा की। यहाँ की कहानियां भी सब पांडवों से प्रेरित है। इसलिए इस मंदिर की भी पांडवों की एक कहानी है। आश्चर्य इस बात पर होता है की पांडव वही कहानियां बार-बार अलग-अलग जगहों पर कैसे दोहराते रहें। ख़ैर वो सब बाद की बात है।
अंदर गए तो देखा एक काली मूर्ति बहुत ही सुंदर लाल कपड़ों से सुसज्जित बैठी है। सुनहरी जीभ उसकी। सुनहरी आँखें। और हर तरह के गहनों से लदी हुई। चारों और चाँदी, और दीवारों पर सोने का काम। परिक्रमा ली तो और भी कई रूप देखें हिंदू देवी देवताओं के। मेरे पास फ़ोटो में सब है।
पंडित से चार सवाल पूछे तो उन्होंने बताया की कहानी उस मंदिर की पुरानी है। भीम ने हिडिंबा से अलग हो जाने के बाद उसके दुःख में तप किया था वहाँ। ये समझने को लिये की वो इतना दुखी क्यूँ है जब उसके भाई ख़ुश है। वो तो अपना पुत्र और पत्नी पीछे छोड़ आया था।
तप किया बहुत तो माँ प्रकट हुई। फिर उन्होंने कहाँ: वर माँगो। बहुत आग्रह करने के बाद उन्होंने जब वर माँगा तो कहा की अभी द्वापर युग में ही इतना घोर अत्याचार है, आगे क्या होगा? आप कलयुग में सब अच्छे लोगों की सुरक्षा करें यही मेरी विनती है।
माँ ने फिर कहा की मैं तेरे ही नाम से जानी जाऊँगी पुत्र और रक्षा करुँगी। इसलिए वहाँ भीम काली की स्थापना हुई। तबसे मूर्ति वही है। यही सादी कहानी पंडित ने हमें शायद आधे घंटे में सुनायी।
बाप रे। मुझे लगा कि इनका कहानी बताने का तरीक़ा बच्चों को दिखा कर ये बोलना चाहिए की देखो, ऐसे नहीं लिखना।
हालत ख़राब हो गयी। वहाँ पर एक बंदा जापमाला का जाप कर रहा था वो भी कहानी सुनने लगा। ख़ैर सारी बात हुई, और उस रिमझिम बारिश के मौसम में हम बाहर आएँ। नीचे पांडवों की मूर्तियाँ भी है, और उनको भी लोग देख सकते है।
सामने व्यास नदी ज़ोर से बह रही थी। वो बंदा माला वाला बहुत ज्ञान दे रहा था। परन्तु उसने बताया कई गाँवों को वो पुनर्वास कर रहा है अपने सोशल उद्यमिता के काम से। कोविड में सब खेती बाड़ी छिन गयी और लोग डाकू बन गए। तो यही है पुनर्वास।
फिर वो फ़्लाईओवर भी बना रहा है पराशर के पास जिससे वहाँ पर एक तो लोगों को काम मिले, प्रॉडक्ट्स बने, पेड़ो के ही, और भू-क्षरण भी कम हो प्लांटेशन से। कहता है यहाँ पहले देवदार के पेड़ हुआ करते थे बहुत और अब नहीं हैं। जबकि इस हाइवे पर देवदार नहीं होते, पर यहाँ थे। तो एक तो निर्माण और दूसरा गौं खा जाती है छोटे-छोटे पौधों को।
वहाँ से हम गए आगे ड्राइव कर के एक और १२-१३ शताब्दी के मंदिर। मैं नाम भूल गयी पर वो उस फ़ोर्क पर था जहाँ से एक और रास्ता आई आई टी मंडी जाता है और दूसरा और आगे विक्टोरिया पुल तक। पुराना विशालकाय मंदिर, सुंदर सा।
बहुत पुरानी पत्थरों से खुदायी हुई मूर्तियाँ और दीवारें। वहाँ से फिर हम निकले और सोचा गाड़ी नहीं लेंगे और पैदल ही चलें पुल की और। वहाँ तो बहुत मंदिर थे सामने ही। कहते है मंडी में ६०८ मंदिर है शायद। बाप रे।



विक्टोरिया पुल की सैर की और आगे चले बाज़ार की पतली गलियों में और फिर अंदर ही अंदर और पुराने मंदिर हैं पर हम किसी में गए नहीं। बाहर भी नदी के तट पर हनुमान घाट है जिस पर एक शरीर को जलाया जा रहा था। और तट से आगे चलो तो सीधे-सीधे एक पुराना मंदिर आता है वही नगगर स्टाइल मंदिर जो जैसे एक द्वीप पर बना हो। मुझे वो बहुत सुंदर लगा। हम वहाँ अभी गए नहीं है। उसके बाद हम अंदर चलें गए और अब हमें भूख भी लगी थी।
हमने एक दो दुकानें देखी और फिर हम पहुंचे एक कैफ़े ट्रीट और वहाँ हमने एक छोले भटूरे ऑर्डर किए। ऊपर बैठें हम। भटूरे अच्छे थे और हमने छोले चावल और ऑर्डर किए फिर। उस दुकान पर बैठ कर मुझे ये नुक़सान हुआ की टेलिविज़न पर शुभ मंगल सावधान आ रही थी और मैंने थोड़ी सी वो देखी और फिर रात को मुझे पूरी ही पिक्चर देखने का मन किया।
खा पी कर हम निकले और थोड़ा इधर-उधर और घूमे और लोगों से बातें की। फिर हमने विक्टोरिया पुल को फिर से क्रॉस किया और पहुंचे गाड़ी तक और गाड़ी से आई आई टी मंडी गए। बहुत ही सुंदर कैम्पस एक बहुत ही बड़ी जगह में बस नदी के ऊपर, पहाड़ों के नीचे। वाह। वहाँ से मुड़ गए उलटा और पता चला की वहीं पराशर का रास्ता है। सामने पराशर वाली चोटी भी देखी। एक दुकान पर चाय पी।
ये याद रखना की सामने की फ़ोटोज़ है कुछ मेरे पास और तरुण गोयल की अगर फ़ोटोज़ देखी जाएँ तो मुझे समझ में आया की उसने उन्ही़ं चोटियों को नाम के साथ कई जगह फ़ोटो डाली हैं।
सब चीज़ों की मैंने बहुत तस्वीरें ली। फिर हम वापस घर आए और मैंने मिन्त्रा पर सर्च करने के बाद पिक्चर्स देखी और बस।
मंडी एक ऐसा शहर जहाँ पुराने और नए का संगम हर जगह बहता है।
क्या वो भी याद है कि उहल रिवर मिलती है अपने मटियाले रंग को ले कर व्यास के सलेटी रंग में तो कितनी देर दोनो अलग अलग रंग दिखते है पानी में?
ऐसा ही है मंडी शहर।
एक तरफ़ उसमें नया और एक तरफ़ पुराना। थोड़ी देर दोनो का रंग अलग-अलग दिखता है, फिर जैसे पर्यटक शहर में रचने बसने लगता है, तो सब मिल जुल कर एक सा लगता है। अरे हम बीच में घूमते-घूमते पार्किंग के पास भी निकले थे और वो एक जो पार्क है वहाँ गए थे। वहाँ क्लॉक टावर है। वहाँ पुल पर दो गधे थें जिनको हमने एक केला खिलाया। फिर उतर कर नीचे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में गए और कॉफ़ी पी।
वहीं तो देखा मैंने ऊन दो आंटियों को और वो एक परिवार को जिनके तीन बच्चे पेड़ों पर चढ़ने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। मैं उनको पेड़ पर चढ़ना सिखाने वाली थी पर पतिदेव ने कहाँ घर चलने को। तो चल पड़े हम।


क्या आप भी मंडी शहर घूमना पसंद करेंगे?

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In my vivid narrative style (that readers love, ahem), I have told my most incredible adventures, including a nine-month solo trip to South America. In the candid book, the scoldings I got from home for not settling down and the fears and obstacles I faced, along with my career experiments, are laid bare. Witty and introspective, the memoir will make you laugh and inspire you to travel, rediscover home, and leap over the boundaries.
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